विपिन बिहारी वर्मा

केजरीवाल जीत गये, उनकी तीसरी बार जीत हो गई, वे बड़े खुश होंगे, होना भी चाहिए, सत्तर मे बासठ भी कुछ कम नहीं, भले ही सत्तर में सरसठ न हुआ यह और बात है, यह अच्छा हुआ कुछेक कहेंगे बहुत अच्छा हुआ, कुछेक अभी से उनमें अगले पीएम की संभावना देख रहे हैं लेकिन कुछेक का कहना है कि यह बहुत बुरा हो गया। वजह, इसमें मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण हो गया तो इसमें नया क्या है यह तो हमेशा से होता आया है। कुछ बातें नयी हो गयीं, जैसे कि कॉग्रेस वालों ने भी अपने मतों को आम आदमी पार्टी में जानें से नही रोका बल्कि जानबूझ कर जानें दिया। वे तो जानते थे कि उनकी पार्टी को इतने मत नही मिलने वाले हैं कि वे सरकार बना लें, दूसरी तरफ उन्हें जो भी मत मिलते वे ‘‘आप’’ से ही कट कर मिलते और बहुत संभावना थी कि भाजपा की सरकार बन जाती और यही तो वे नही चाहते थे। अब भाजपा वालों की समझ मे यह बात आ चुकी है कि उनका ‘‘खेल बिगाड़ने के लिए अन्य पार्टियों ने अपना खेल बिगाड़ लिया है’’। उसके बाद तो सब कुछ आसान था, है कि नही ? अगर कुछेक मतदान क्षेत्रों को छोड़ दें तो अभी भी 80ः20 का रेशिओ है या उतना भी नही है। अगर उनके पक्ष में मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण हो सकता है तो भाजपा के पक्ष में हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण क्यों नही हो सकता ? इसमें भी बुरा क्या है ? अगर वे ‘‘इमामों’’ से मिल सकते हैं, उनसे उनके क्षेत्र का एक एक वोट मॉग सकते हैं तो हिन्दू ही पीछे क्यों रह जाये ? अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा, वोटिंग का पैटर्न ही नही बदल जायगा क्या ? अगले दस बीस सालों तक के लिए भाजपा की गारंटी हो जायगी कि नही, और अगर एक तरफा वोटिंग का चलन शुरु हुआ तो यह क्या अच्छा होगा ?

केजरीवाल कहते हैं कि यह ‘‘भारत माता की जीत है’’ तो क्या भारत माता ने मौलवियों की तनख्वाह बढाने का आदेश दिया था ? वे यह भी कहते हैं कि यह ‘‘हनुमान जी ने यह कृपा बरसायी है’’ तो क्या हनुमान जी ने उनसे और उनके लोगों से शाहीन बाग में जानें और वहां लगभग दो माह से अधिक समय से जारी ईलीगल बंद को समर्थन देने को कहा था ? किधर से बचेंगे वे, वे कहते हैं कि ‘‘मुस्लिम महिलाओं को वोट डालने के पहले अपने घर के मर्दो से इस पर विचार अवश्य कर लेना चाहिए कि वोट किसे देना ज्यादा अच्छा रहेगा, इस पर काफी कुछ कहा सुना जा चुका है। केजरीवाल अपनी तिकडी मना चुके और बस बहुत हो गया। अब और नहीं ? दिल्ली में कोई मरियल सरकार नही है, वह घर मे घुस कर मारना जानती है। अगर वह चुप है तो इसमें भी उसकी कोई रणनीति होगी। इसी के साथ वह केन्द्र सरकार को वह ‘‘मसाला’’ भी दे चुके जो उन्हें कत्तई नही देना चाहिए था। अब बिहार हो कि बंगाल हो, सभी राज्य आसानी से भाजपा की झोली में गिरते जायेगे। क्या विपक्ष ऐसी स्थिति ही चाहता था ?

बेहतर हो कि हम देखें कि 2015 के दिल्ली विधान सभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को कुल 54.03 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि इस बार भरपूर जोर लगा देने और पूरे मुस्लिम मतों के प्राप्त होने के साथ साथ अन्य पार्टियों के मत प्राप्त होने के बावजूद भी मतदान का प्रतिशत 53.57 प्रतिशत ही रह गया यानी कि कुछ घटा। दूसरी ओर 2015 के दिल्ली विधान सभा चुनावों में भाजपा को कुल 32.3 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि 2020 के दिल्ली विधान सभा चुनावों मे यह आंकड़ा बढ़कर 38.57 हो गया। यह पांच वर्षों मे छः प्रतिशत से अधिक बढ़ा है जबकि जीत के लिए कुछ भी गलत या अनावश्यक नही किया गया था। एक बात और, शीला दीक्षित वाली कांग्रेस पार्टी को 2015 के चुनावों मे कुल 9.7 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे जो इस वर्ष लगभग 03 प्रतिशत घट गये। यह भी कहा सुना जा रहा है कि चूंकि कांग्रेस जानती थी कि वह सरकार नही बना पायेगी और दूसरी ओर भाजपा को सरकार बनाने से रोकना भी था और यह ज्यादा जरुरी था इसीलिए कांग्रेस ने आंतरिक घुसपैठ या साजिश कर अपने वाले वोटों को भी आम आदमी पाटी के खाते मे जाने दिया ताकि भाजपा को सरकार बनाने से रोका जा सके। अब यहीं से भाजपा को हिन्दू कार्ड खेलने का नायाब मौका मिलता है और खास बात है कि कोई इसे गलत कह भी नही पायेगा। तो अगले चुनाव में क्या होगा ? आपको क्या लगता है ?

दिल्ली के अलावा कई अन्य राज्यों में गुणगान चालू है, ‘‘केजरीवाल मॉडल ऑफ डेवलपमेन्ट’’ भी निकल चुका है,आज सभी उनको भावी प्रधानमंत्री के रुप मे देख रहे हैं, केजरीवाल खुद भी भीतर ही भीतर इस पर काफी खुश हैं। पता नही क्या होगा लेकिन अगर ‘‘फ्री’’ वाली राजनीति ही इस देश को पसंद आयी तो अगले कुछ सालों में यह देश भी वेनेजुएला बन जायेगा। कहना तो नही चाहिए लेकिन वेनेजुएला का मौजूदा हाल यह है कि वहां तेइस शहरों में बिजली की लाइन काट दी गयी है क्योंकि बकौल सरकार उसके पास इसके लिए पैसे नही हैं। इधर दिल्ली का चुनाव जीतेंगे कि नही जीतेगे यही उहापोह चल रही थी कि लगा कि आम आदमी पार्टी दिल्ली का चुनाव जीत रही है और इस ‘‘लगने’’ के साथ ही जीत की घोषणा से लगभग दो घंटे पूर्व केजरीवाल को दिल्ली ही नही बल्कि पूरे देश का नेता बना दिया गया। भगवान जाने क्या होगा इस देश का लेकिन उसके पहले यह भी एक विकट सवाल है कि क्या होगा केंजरीवाल का ? अभी दो दो नये भावी प्रधानमंत्री हो गये हैं एक तो केजरीवाल और दूसरे महाराष्ट के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और दोनों ही में भिड़ंत होने वाली है। महाराष्ट मे नगर पालिका के चुनाव होने वाले हैं और केजरीवाल की ‘‘आप’’ उसमे भाग लेकर शिवसेना के रंगरूटों द्वारा किये गये भ्रष्टाचार संबंधी पोल खोलने वाली है। अब पता नही कि अरविन्द केजरीवाल की निशानदही पर उद्धव
ठाकरे विश्वास कर पायेंगे या नही ? वैसे केजरीवाल अतिशय महत्वाकांक्षी हैं और ये किसी अन्य बात को वैल्यू भी नही देते, यह बात तो वर्ष 2014 में ही साबित हो चुकी है जब 49 दिनो के मुख्यमंत्री का शासन चलाने और इस बात से बिल्कुल बेखबर होकर कि चुनावों में कितने लोग, कितना समय और कितनी रकम खर्च होती है इन्होंने इस्तीफा दिया था, सोचा होगा कि लोग मुख्यमंत्री तो बना ही रहे हैं प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब भी अभी ही पूरा क्यों न कर लिया जाय लेकिन क्या करें, ये झटका खा गये। सही है कि ये इस बार भी चुनाव जीत गये हैं लेकिन अब तक इनके पक्ष/विपक्ष में लोगों की अच्छे हद तक जो राय बन चुकी है और वह अच्छी नही है।

पसरने का कोई भी मौका ये छोड़ते नही हैं लेकिन पसर पाते नही हैं यह और बात हैं। अब भारतवासियों को यह सब देखने की आदत हो गयी है और यही बात केजरीवाल के खिलाफ जाती है। वर्ष 2014 के ही लोकसभा के चुनाव में इन्होंने हड़बड़ी में अपनी पार्टी के 438 उम्मीदवारां को खड़ा किया था और रीजल्ट क्या हुआ ? उसमें से 434 की जमानत जब्त हो गयी, यह बात क्या इनके भावी प्रधानमंत्री होने की इशारा करती है ? बिल्कुल नहीं। इनके कार्य कितने सही और शोभनीय है अथवा नहीं हैं इस बात की चिन्ता तो ये करते ही नही है। सभी विपक्षियों जिनके साथ इनकी अब तक मिली भगत रही हैं को छोड़ कर ये बारंबार ‘‘प्रधानमंत्री का आर्शीवाद’’ क्यों खोज रहे हैं ? इसमें जो भी दाव पेंच हैं वह भारत की जनता तो समझती ही है। बिजली फ्री, पानी फ्री, बस भाड़ा फ्री, स्कूल फ्री, इलाज फ्री, इतना ‘‘फ्री शिप’’ के लिए पैसा कहां से आयेगा अगर प्रधानमंत्री नही मिलते और मोदी जैसे पीएम से तो उन्हें इसकी आशा छोड़ ही देनी चाहिए। अभी हमारा पीएम ऐसा है जिसके सामने टंम्प भी नही ठहर पाते। यही केजरीवाल शिकायत करते थे कि हजार दो हजार खर्च करके लोग दिल्ली आते हैं और लाखों का इलाज कराके चले जाते हैं। उस समय दिल्ली के असली साहूकार यही थे जो मौका देखकर ‘‘बड़े बेटे’’ बन गये थे। मौका देख कर कन्हैया कुमार के खिलाफ केस चलवा दिया, वही कन्हैया कुमार जिसके साथ कभी मंच शेयर करते थे। अब ये अपनने आप को ‘‘दिल्ली का बड़ा बेटा’’ नही बताते, अगर बतायेंगे तो वहां रोज हो रही लूट पाट और आगजनी के बारे मे क्या कहेंगे और इसे रोक पाने मे अपनी अक्षमता की क्या सफाई देंगे ? बुरबक बना कर वोट तो खीच लिया, अब तो वह हो रहा है जो आगामी पांच वर्षों तक होता रहेगा, अब कहने को बचता ही क्या है या यूॅ कहिए कि कहने की जरुरत ही क्या है ?

कभी कभी लगता है कि यह आदमी बेहद समझदार है और कभी कभी ये नासमझी के पुतले नजर आते है।ये ठहरने वाले, आराम से एक एक सीढ़ी चढ़ने वाले नेता नहीं हैं बल्कि सीधे सीधे कई कई सीढियाँ छलांग लगाने वाले नेता नजर आते है। पॉलिटिक्स मे ऐसा होता नही है। ये लालू वाली तेजी दिखाने की कोशिश करते नजर आते हैं। एक बार में सीएम और केवल उनचास दिनों बाद उसी तरह पीएम बनने की कोशिश करते हैं लेकिन होता यह है कि बजाय पीएम बनने ये पहुँच जाते हैं अपनी ‘‘खास जगह’’ पर। लेकिन अब एक और बात हो गयी है, दिल्ली की केजरीवाल सरकांर बनेगी कि नही और वजह है सुप्रीम कोर्ट। एक नया आदेश है कि सरकार में कितने ‘‘दागी’’ व्यक्ति शामिल हैं और किस वजह से उन्हें टिकट दिया गया था इस बारे मे पार्टी अध्यक्ष को दो घंटे के अंदर अपनी पार्टी के वेबसाईट पर पूरी जानकारी अपलोड करनी होगी और केजरीवाल सरकार मे ‘‘दागी’’ मंत्रियों की संख्या आधे से ज्यादा है। यह कहा जा सकता है कि केन्द्र सरकार द्वारा जानबूझ कर ऐसा किया गया है लेकिन वे भी ऐसा क्यों करेंगे ? उनकी दिल्ली वाली सरकार भी तो है। नियम तो लागू उनपर भी होगा ही लेकिन अगर किसी सरकार में जानबूझ कर ऐसे ‘‘दागी’’ लोगों को रखा जा रहा है तो उसे तो दिक्कत होगी ही। यही दिक्कत अब केजरीवाल सरकार को होने वाली है। अगर केजरीवाल अपने पुराने वाले कैबिनेट को रखते हैं तो उसमे आधे से ज्यादा दागदार चेहरे होंगे और उन्हें तुरंत बताना पड़ जायेगा कि उन्होंने उन्ही का चुनाव क्यों किया है ? क्या पता केजरीवाल सरकार का गठन इसीलिए नही हो पा रहा हो ? जितनी भी ‘‘छोटी’’ सी केजरीवाल सरकार आयी है, अपने साथ मार पीट और आगजनी लायी है।  उम्मीद थी फ्रि शिप की लेकिन क्या कीजियेगा, अब आपका वोट मिल चुका है और अगले पांच वर्षों तक आपको पिसते रहना है।

इस लेखक का स्पष्ट मत है कि राजनीतिज्ञों को उनके बयान के आधार पर नही बल्कि उनके कार्यों के आधार पर समझा जाना चाहिए। बयान तो अच्छे अच्छे वही देते हैं जो अच्छा करते नहीं। ये देखिये ये कौन हैं एक लाईन से शरजील ईमाम, वारिस पठान, ताहिर हुसैन, फैजुल हसन, अमानतुल्लाह खान, मनीष सिसोदिया, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, प्रशांत भूषण सभी एक से बढ़ कर ‘‘खांटी देशभक्त’’ और इनके अपने पत्रकार रविश कुमार, राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त, इनके मुखारविन्द से केवल सच ही निकलता है ? है कि नहीं ? और सबसे बढ़कर अरविन्द केजरीवाल जो सबके मास्टरमाइंड हैं। कहां कब क्या बोलना है और कब चुप रहना है खूब जानते हैं। एक और हैं ओवैसी, बहुत काबिल बैरिस्टर हैं, अपने मंच से वारिस पठान को पन्द्रह पन्द्रह मिनट तक भड़ास निकालने देते हैं, ‘‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’’ के नारे लगवाते है और नारे लग जाने के बाद झट से माईक छीन लेते हैं। आप सभी को भारत की जनता देख रही है और समय पर जवाब देगी। जवाब सुन कर अगर आपके तोते उड़ते हैं तो उड़ें, आपने जो किया है उसे काफी समय तक बर्दाश्त करने के बाद वह जवाब होगा और नतीजे मे अगर अगले दो दशकों तक आपकी या आपके खानदान की पॉलिटिक्स खत्म होती है तो हो जाय। आप लोगों ने काम तो याद रखने लायक किया ही है, जनता याद रखेगी कि आपकी लाईन पर जो चले, उसे वोट नहीं देना है।

आम आदमी पार्टी जीत चुकी, तैयारी पहले से ही चल रही थी, सोची समझी साजिश के तहत दिल्ली के खास खास मुस्लिम बहुल इलाकों मे चुन चुन कर हिन्दुओं के, जैनों के दुकानदारों को लूट लिया गया, सैकड़ों गाड़ियों को और बाकी बचा सामान जला दिया गया। मुसलमानों के दुकानों के साथ जरा सा भी गड़बड़ी नही की गयी है। उनकी दुकानों को आग की लपट छू भी नही पायी। हाजी यूनूस जैसे विधायकों और ताहिर हुसैन जैसे वाउर् काउन्सिलरों की देखरेख मे सारे घटनाक्रम को अंजाम दिया गया, बीस से पच्चीस हजार की संख्या में नीले नीले हेलमेट पहने उग्रवादियों ने यह सब कुछ किया, जान पहचान वाले मुसलमान ‘‘भाई’’ हिन्दुओं को बता रहे थे कि वे अपने बचाव मे जो भी संभव हो करें और वे उनकी कोई भी मदद नही कर सकते। इधर प्रदीप सिंह जैसे ‘‘आप’’ नेताओं से केजरीवाल की घृणास्पद बातचीत का वीडिओ जारी हो चुका है, उसमें संजय सिंह जैसे ‘‘आप’’ सांसद भी शामिल हैं। मांग की जा रही है कि केन्द्र सरकार केजरीवाल सरकार के विरुद्ध भारतीय संविधान की धारा 356 का इस्तेमाल करते हुए इसे बर्खास्त करे और दिल्ली वासियों की एक आततायी सरकार से जान बचाये और हिन्दु कार्ड खेल देने का सही मौका भी यही है।


प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार और तथ्य उनके अपने है, दैनिक सृजन प्रबंधन इसके लिए किसी भी परिस्थिति में उत्तरदायी नहीं हैं।

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