130 करोड़ भारतीयों के दुआ का समय- डॉ पी के सिन्हा

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 ‘‘तेरी सादगी का हुस्न भी लाजवाब है,मुझे नाज है के तू मेरा इंतखाब है’’

नई दिल्ली।आज के दौर में यह उक्ति चरितार्थ हो रही है। इस्लाम धर्म में सबसे पवित्र महीना माना जाने वाला रमजान दस्तक देने वाला है. रमजान के महीने में मुसलमान व्रत यानी रोजा रखते हैं और शिद्दत से अल्लाह की इबादत करते हैं. इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक रमजान की शुरुआत चांद देखने के बाद होती है. इस साल भारत में रमजान का महीना 24 या 25 अप्रैल से शुरू होने की उम्मीद है. अगर 24 अप्रैल को रमजान का चांद दिखाई दिया तो 25 अप्रैल को पहला रोजा रखा जाएगा, नहीं तो 26 अप्रैल का पहला रोजा होगा। रमजान के महीनों में आचार विचार की एक ऐसी संस्कृति सभ्यता को विकसित करना चाहिए जिसमें न तो संकीर्ण मानसिकता हो, ना ही संकीर्ण विचार हो, ना ही संकीर्ण बर्ताव हो । उक्त बाते राष्ट्र सृजन अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय चिंतक एवं विचारक डॉक्टर प्रद्युम्न कुमार सिन्हा ने कही। उन्होंने कहा पैगंबर मोहम्मद साहब सिर्फ मानव ही नहीं पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीव जंतु को परमपिता परमेश्वर के अंश मानते थे । ऐसा ही भारतीय संस्कृति एवं हिंदू धर्म के अनुयायी के उपदेश कहा जाता है । ‘‘वसुधैव कुटुंबकम्’’ 130 करोड़ भारतवासी आज इस संकट की घड़ी में इस महान सोच को आगे बढ़ाना है, ऐसा संकल्प लें इसके लिए हम सभी को अपने सोच आचार विचार एवं आचरण व्यवहार में भी बदलाव लाया जा सके। इसके लिए न तो कोई हिन्दू होगा न मुसलमा और न सिक्ख न ईसाई सबसे पहले वह होगा भारतीय। डॉक्टर सिन्हा ने कहा ‘‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिंदी हैं हम वतन हैं हिंदोस्तां हमारा’’ ऐसी परिस्थिति में एक दूसरे के काम आना सबसे बड़ी जरूरत की बात है।


इस वैश्विक महामारी के समय में एक दूसरे के सुख दःुख में काम आना चाहिए, यह पूरी दुनिया उसी समय तक रहने लायक रहेगी जब तक हम आपस में प्रेम, मोहब्बत त्याग, सद्भाव या लगाव के साथ एक दूसरे से स्थाई संबंध बनाने में सफल होंगे । कोई जरूरी नहीं कि इस कार्य को करने के लिए हम सभी का मजहब ,धर्म ,संप्रदाय विचार एक ही हो। हमारी सोच अलग हो सकती है परंतु हमें कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी मातृभूमि , राष्ट्रभूमि जन्मभूमि भारत माता ही है । हम सभी 130 करोड़ भारतवासियों का खून भी एक ही रंग का है । हम सभी को पैदा करने वाला, संचालित करने वाला वह परमपिता परमेश्वर भी एक ही है। भले ही हम उसे विभिन्न नामों से जानते हैं एवं पुकारते हैं । जब परमपिता परमेश्वर कभी किसी का बुरा नहीं चाहता सदैव भला ही चाहता है तो क्यों नहीं हम भी इस रमजान के पावन पवित्र महीने में सभी 130 करोड़ भारतवासियों के कल्याणार्थ अपने ईश्वर से यही दुआ करें कि हमें इस संकट की घड़ी से उबारे। । हमारी एकता और अखंडता, कोविड-19 के विरुद्ध हमारी जंग, वचनबद्धता, प्रतिबद्धता एवं बचाव से ही हमारी जीत सुनिश्चित है ।
डॉ सिन्हा ने कहा इस वैश्विक महामारी जैसे संकट की घड़ी में अलगाव, भेदभाव, हिंसा की नीति से तो हमारी हार ही होगी। हम सभी 130 करोड़ भारतवासी को यह शपथ लेना चाहिए कि तैरेंगे साथ और डूबेंगे साथ। डॉक्टर सिन्हा ने कहा यह दुआ का समय है , हमें अपने मन में दुश्मन के प्रति भी गलत विचार नहीं रखना चाहिए , बुरे से बुरा हाल हो तब भी हमें किसी को बददुआ नहीं देना चाहिए । रोजा का मतलब हम सब सिर्फ भोजन और भोग विलास से स्वयं को ना रोके बल्कि रोजा हमारी आन, हमारे शान, और कर्म हमारे व्यवहार, हमारे सद्भाव , हमारे अहिंसक बर्ताव का प्रतीक होना चाहिए। हम सभी को मिलकर रमजान में आचरण व्यवहार की ऐसी सभ्यता को विकसित करना चाहिए जिसमें संकीर्ण मानसिकता नहीं हो, जिसमें कोई पराया नहीं हो, हम सब सुख-दुख में एक दूसरे के साथ हो ।
इस समय दुनिया जिस महामारी से जूझ रही है, इंसानियत दांव पर लगी है, कोरोना जैसी महामारी कोई क्षेत्र नहीं देखता, कोई धर्म संप्रदाय, समाज, जाति नहीं देखता इसलिए इस दःुख की घड़ी में लोग यह सुनिश्चित करें, इबादत प्रार्थना को अपने घर तक ही सीमित रखें और इसे व्यक्तिगत बनाएं । आज पूरे विश्व में सोशल डिस्टेंस इसका मात्र इकलौता उपाय है, और इस्लाम इसमें कहीं रुकावट नहीं बनता है। मुसलमानों का पूरे विश्व में तीन पवित्र स्थल मक्का के काबा दूसरा मदीना में पैगंबर की मस्जिद और तीसरा यरुशलम में वेट अल मकदिस इन तीनों पाक जगहों पर भी पाबंदी लगाई जा चुकी है ।
इंसानी जिंदगी सबसे अधिक मूल्यवान है इबादत के लिए जिंदा रहना बहुत जरूरी है । इसलिए तमाम मुफ्तियों और मजहबी इदारों ने यही संदेश दिया है कि रमजान के समय अपने अपने घर में रहकर इबादत करें , और संपूर्ण भारतवासियों के कल्याणार्थ दुआ करें।

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