लाक डाउन की हकीकत. फेज 1 से 3 …………………..

 श्रवण कुमार की रिर्पोट

चंदौली। आज की हकीकत से रूबरू करा रहे गाॅंव की हकीकत को ‘‘ केशरी’’ फिल्म के गाने की यह लाईन सटीक बैठती है- ‘‘ तेरी मिट्टी में मिल जावा गुल बन के खिल जावा इतनी सी है दिल की आरजू’’कोराना वायरस ने पूरी दुनियां को हिला कर रख दिया है। अब-तक हजारों लोगों को अपना निवाला बना चुका है। वहीं दुनियां के करोड़ों मजदूरों के रोजगार पर संकट खड़ा कर उन्हें भूखे पेट मारने की फिराक में लगा हुआ है। इस वायरस ने इतना दहशत मचा रखा है कि लाक डाउन के दौरान सैकड़ो मिल से गरीब मजदूर पैदल अपने वतन के लिए चल पड़े वहीं कितनों ने रास्ते में ही इस दुनियां को अलविदा कर दिया। अब तो वे यह कहते हुए चल रहे है कि ‘‘ आवाद रहे वो गाॅंव मेंरा जहाॅं लौट के वापस  जा न सके। ’’आज हर व्यक्ति को स्वयं से डर सताने लगा है। सभी सामाजिक रिस्तों में दूरीयां बना कर रख दिया है। इस लाक डाउन में बेरोजगार हुए मजदूरों की जुबानी उनकी दुःखद कहानी सुन कर हर कोई का दिल पसीज जा रहा है। इलाहाबाद में एक दुकान पर नौकरी करने वाले मजदूर भोला नाथ ने बताया कि लाक डाउन जब से लगा है तब से घर पर ही रहने को विवश हो गया हूं। उसी नौकरी से पूरा घर चलता था। दिवाकरपुर गांव के संदीप कुमार, हकड़ू, पप्पू, दया आदि का कहना है कि गुजरात में प्राईवेट नौकरी करके पूरा घर चलाया जाता था। इसी तरह तेजू प्रसाद, प्यारेलाल, सुभाष, समशेर यादव, सोनू पाण्डेय सहित अन्य मजदूरों का कहना है कि दिल्ली, मुम्बई आदि शहरों में नीजी कम्पनीयों में नौकरी करके भरण-पोषण करते रहे। वहीं कुछ ने कहा कि बहन की शादी करनी है तो किसी ने लोन भरने की दुखड़ा सुनाया। कमोवेश सभी मजदूरों का रोना रहा कि अब लाक डाउन लगने से रोजगार पर ताले लटक गये हैं। वहीं पेट के निवाले के लाले पड़ने लगे हैं। कोरोना महामारी ने हमारे जीवन और भोजन पर संकट खड़ा कर दिया है। जिससे उबरने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। अब सरकार भी थकती नजर आने लगी है। मजदूरों को उबारने के बजाय घर पर भेजने में ही अपनी जिम्मेदारी निभाकर इतिश्री करना चाहती है।

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