1. एक दिन पूर्व चन्दौली में 24 बाल श्रमिकों को गुजरात से लाकर बाल कल्याण समिति को सौंपा गया।

 

दैनिक सृजन न्यूज नेटवर्क
लेखन और संकलन
देवेन्द्र(जिला संवाददाता चन्दौली)

दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य इमरजेंसी के कारण बाल श्रमिक सबसे ज्यादा जोखिम में है भारत में एक करोड़ से ज्यादा बाल मजदूर है ।जो लाकडाउन के की बजह पलायन को मजबूर हुए। मजदूरी छूट जाने से कई बाल मजदूरों के सामने भोजन का संकठ खड़ा हो गया,और वे पैदल ही अपने घरों तक का सफर तय करने को मजबूर हुए।केवल इतना ही नहीं लॉकडाउन के दौरान गांव वे बच्चे भी लौटे हैं जो नौकरी के झांसे में फंसकर बड़े शहर चले गए थे और फिर बंधुआ मजदूर बना लिए गए। महामारी के दौर में संयुक्त राष्ट्र संघ ने दुनिया के 15.2 करोड़ बाल श्रमिकों और बेघर बच्चों को सबसे दयनीय व संक्रमण के सर्वाधिक खतरे वाला समुदाय माना है। इन बच्चों तक साफ पानी और साबुन की पहुंच तक नहीं है जिससे ये कोरोना से खुद का बचाव कर सकें
पूरी दुनिया के लिये बाल श्रम की समस्या एक चुनौती बनती जा रही है। विभिन्न देशों द्वारा बाल श्रम पर प्रतिबंध लगाने के लिये समय समय पर विभिन्न प्रकार के कदम उठाए गए हैं। इस क्रम में दुनिया भर में बाल श्रम की क्रूरता को समाप्त करने के लिये हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। बाल श्रम को काबू में लाने के लिये विभिन्न देशों द्वारा प्रयास किये जाने के बाद भी इस स्थिति में सुधार न होना चिंतनीय है।

बाल श्रम निषेध दिवस इतिहास

अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ, संयुक्त राष्ट्र संघ की एक शाखा है। यह संघ मजदूरों तथा श्रमिकों के हक के लिए नियम बनाती है, जिसे सख्ती से पालन किया जाता है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ कई बार पुरस्कृत भी हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ ने ही अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहली बार बाल श्रम को रोकने अथवा निषेध लगाने पर बल दिया था, जिसके बाद 2002 में सर्वसम्मति से एक कानून पास कर किया गया। इस कानून के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से श्रम कराने को अपराध माना गया। इसी साल पहली बार बाल श्रम निषेध दिवस 12 जून को मनाया गया।

भारत में बालश्रम से संबधित रिपोर्ट

• बाल श्रम के खिलाफ कार्यरत संगठन बचपन बचाओ आंदोलन(बीबीए) की रिपोर्ट कहती है कि भारत में लगभग सात से आठ करोड़ बच्चे अनिवार्य शिक्षा से वंचित हैं.
• इस आंकड़े में अधिकतर बच्चे् संगठित अपराध रैकेट (organised crime rackets) का शिकार होकर बाल मजदूरी के लिए मजबूर किए जाते हैं जबकि बाकी बच्चे गरीबी के कारण स्कू ल नहीं जा पाते हैं.
• वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 5 से 14 साल के 25.96 करोड़ बच्चों में से 1.01 करोड़ बाल श्रम के शिकार हैं.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार

संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, 541 मिलियन युवा श्रमिकों (15 से 24 वर्ष) में 37 मिलियन बच्चे हैं जो खतरनाक बाल श्रम का काम करते हैं।
यह विश्व के कुल श्रमिक क्षमता का 15 प्रतिशत है। इन श्रमिकों को कार्य करने करने के दौरान अन्य श्रमिकों की तुलना में 40 प्रतिशत अधिक घातक चोटें लगती हैं।
‘सेव द चिल्ड्रेन’ रिपोर्ट के अनुसार
इस रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के आधे से अधिक बच्चों को गरीबी, संघर्ष और लड़कियों के खिलाफ भेदभाव का खतरा है।
ये बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं यहाँ तक कि स्वास्थ्य देखभाल तथा भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से भी वंचित रहते हैं।
इन बच्चों से उनकी मासूमियत छीन ली गई है और उनका बचपन एवं भविष्य जिसका उन्हें हक़ है वह भी छीन लिया गया है।

क्या है बाल श्रम

बाल श्रम आमतौर पर मज़दूरी के भुगतान के बिना या भुगतान के साथ बच्चों से शारीरिक कार्य कराना है। बाल श्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, यह एक वैश्विक घटना है।

बाल श्रम के कारण

यूनीसेफ के अनुसार, बच्चों का नियोजन इसलिये किया जाता है, क्योंकि उनका आसानी से शोषण किया जा सकता है।
बच्चे अपनी उम्र के अनुरूप कठिन काम जिन कारणों से करते हैं, उनमें आमतौर पर गरीबी पहला कारण है।
इसके अलावा, जनसंख्या विस्फोट, सस्ता श्रम, उपलब्ध कानूनों का लागू नहीं होना, बच्चों को स्कूल भेजने के प्रति अनिच्छुक माता-पिता (वे अपने बच्चों को स्कूल की बजाय काम पर भेजने के इच्छुक होते हैं, ताकि परिवार की आय बढ़ सके) जैसे अन्य कारण भी हैं।
भारत और बाल श्रम
भारत में आदिकाल से ही बच्चों को ईश्वर का रूप माना जाता रहा है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य इस सोच से काफी भिन्न है। बच्चों का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है। गरीब बच्चे स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने की उम्र में मज़दूरी कर रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों से भारत सरकार एवं राज्य सरकारों की पहल इस दिशा में सराहनीय है। उनके द्वारा बच्चों के उत्थान के लिये अनेक योजनाओं को प्रारंभ किया गया है, जिससे बच्चों के जीवन व उनकी शिक्षा पर सकारात्मक प्रभाव दिखे।
शिक्षा का अधिकार भी इस दिशा में एक सराहनीय कार्य है। इसके बावजूद बाल श्रम की समस्या अभी भी एक विकट समस्या के रूप में विराजमान है।
बाल श्रम और भारतीय संविधान
संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप भारत का संविधान मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धातों की विभिन्न धाराओं के माध्यम से कहता है-
–14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिये नियुक्त नहीं किया जाएगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जाएगा।
— राज्य अपनी नीतियाँ इस तरह निर्धारित करेंगे कि श्रमिकों, पुरुषों और महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उनकी क्षमता सुरक्षित रह सके तथा बच्चों की कम उम्र का शोषण न हो एवं आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये वे अपनी उम्र व शक्ति के प्रतिकूल काम में प्रवेश करें।

— संविधान लागू होने के 10 साल के भीतर राज्य 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेंगे (धारा 45)।
–बच्चों को स्वस्थ तरीके से स्वतंत्र व सम्मानजनक स्थिति में विकास के अवसर तथा सुविधाएँ दी जायेंगी और बचपन व जवानी को नैतिक व भौतिक दुरुपयोग से बचाया जाएगा।

— बाल श्रम एक ऐसा विषय है, जिस पर संघीय व राज्य सरकारें, दोनों कानून बना सकती हैं।
अन्य प्रयास जो इस संदर्भ में समय-समय पर हुए हैं उनमें प्रमुख हैं:

–बाल श्रम (निषेध व नियमन)
कानून 1986- यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी अवैध पेशे और 57 प्रक्रियाओं में, जिन्हें बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिये अहितकर माना गया है, नियोजन को निषिद्ध बनाता है। इन पेशों और प्रक्रियाओं का उल्लेख कानून की अनुसूची में है।
–फैक्टरी कानून 1948 – यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन को निषिद्ध करता है। 15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी फैक्टरी में तभी नियुक्त किये जा सकते हैं, जब उनके पास किसी अधिकृत चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो। इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिये हर दिन साढ़े चार घंटे की कार्यावधि तय की गई है और उनके रात में काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है।
–भारत में बाल श्रम के खिलाफ कार्रवाई में महत्त्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप 1996 में उच्चतम न्यायालय के उस फैसले से आया, जिसमें संघीय और राज्य सरकारों को खतरनाक प्रक्रियाओं और पेशों में काम करने वाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने और गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया था।
— न्यायालय ने यह आदेश भी दिया था कि एक बाल श्रम पुनर्वास सह कल्याण कोष की स्थापना की जाए, जिसमें बाल श्रम कानून का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के अंशदान का उपयोग हो।
निष्कर्ष
बाल श्रम की समस्या का मूल है निर्धनता और अशिक्षा। जब तक देश में भुखमरी रहेगी तथा देश के नागरिक शिक्षित नहीं होंगे तब तक इस प्रकार की समस्याएँ ज्यों की त्यों बनी रहेंगी।
देश में बाल श्रमिक की समस्या के समाधान के लिये प्रशासनिक, सामाजिक तथा व्यक्तिगत सभी स्तरों पर प्रयास किया जाना आवश्यक हैं।
यह आवश्यक है कि देश में कुछ विशिष्ट योजनाएँ बनाई जाएँ तथा उन्हें कार्यान्वित किया जाए जिससे लोगों का आर्थिक स्तर मज़बूत हो सके और उन्हें अपने बच्चों को श्रम के लिये विवश न करना पड़े।
प्रशासनिक स्तर पर सख्त-से-सख्त निर्देशों की आवश्यकता है जिससे बाल-श्रम को रोका जा सके।
व्यक्तिगत स्तर पर बाल श्रमिक की समस्या का निदान हम सभी का नैतिक दायित्व है। इसके प्रति हमें जागरूक होना चाहिये तथा इसके विरोध में सदैव आगे आना चाहिये।
बाल श्रम की समस्या के निदान के लिये सामाजिक क्रांति आवश्यक है ताकि लोग अपने निहित स्वार्थों के लिये देश के इन भावी निर्माताओं व कर्णधारों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह न लगा सकें।

बाल श्रम निषेध दिवस से पूर्व गुजरात से मुक्त करा कर बाल कल्याण समिति चन्दौली के सामने प्रस्तुत किये गए24 बाल श्रमिक

11.06.2020 गुरुवार को गुजरात राज्य से ट्रेन द्वारा वाराणसी कैण्ट रेलवे स्टेशन से आये बाल श्रम से मुक्त कुल 24 बालकों को बाल कल्याण समिति चन्दौली के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिनके गृह पुनर्वासन हेतु उनके अभिभावक को सुपूर्द किया गया जिन्हें कोरेन्टीन रहने एवं कोविड-19 से बचाव हेतु मास्क, सेनेटाईज़र व सोशल डिस्टेंसिंग को अपनाने के दिशा-निर्देश दिये गये, इस दौरान बाल कल्याण समिति, चन्दौली की अध्यक्ष श्रीमती आराधना गुप्ता, सदस्य श्री इन्द्रजीत शर्मा, श्री दिनेश कुमार, श्री आनन्द कुमार व जिला प्रोबेशन अधिकारी, चन्दौली श्रीमती इन्द्रावती यादव, बाल संरक्षण अधिकारी श्री किशन वर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता श्री ओमप्रकाश भारती, श्रीमती शिल्पी चौरसिया, आउटरीच कार्यकर्ता श्री भैयालाल मौजूद रहे

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