देश भर के मूर्धन्य साहित्यकारों के वेबीनार का हुआ आयोजन

“वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिताः” अर्थात साहित्यकार करता है राष्ट्र का जागरण

साहित्यकार आपातकाल में संजीवनी बूटी का काम करता है—- डॉ दिनेश कुमार शर्मा

दैनिक सृजन नेशनल न्यूज़ नेटवर्क

नई दिल्ली।हिंदी प्रचारिणी सभा अलीगढ़ तथा विश्व संस्कृत हिंदी परिषद्, नई दिल्ली के ने “वर्तमान प्रासंगिकता में साहित्यकारों का राष्ट्रधर्म” विषय पर एक दिवसीय वेबीनार का आयोजन किया।इस वेबिनार की अध्यक्षता डॉ. दिनेश कुमार शर्मा, प्रधानाचार्य, हिंदू इंटर कॉलेज अलीगढ़ तथा अध्यक्ष, हिंदी प्रचारिणी सभा, अलीगढ़ ने किया। जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में डॉ.त्रिभुवन नाथ शुक्ल,पूर्व अध्यक्ष, हिंदी एवं भाषा विज्ञान विभाग, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर तथा बीज वक्ता डॉ.जंग बहादुर पांडेय, पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग, विश्वविद्यालय रांची और विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. उषा श्रीवास्तव, अध्यक्ष अन्य भाषाएं, बेंगलुरु ने अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर डॉ दिनेश शर्मा ने कहा कि साहित्यकार आपातकाल में संजीवनी बूटी का कार्य करता है। साहित्यकार समाज का आचार्य होता है जो पग-पग पर समाज को अपना दिशा निर्देश देता रहता है। बीज वक्ता के रूप में डॉ.जंग बहादुर पाण्डेय ने कहा कि जब देश पर विपत्ति हो तो साहित्यकार की महती भूमिका होती है। साहित्यकार समाज का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्यकार उस समाज का दृष्टा और सृष्टा भी होता है।हिंदी साहित्य का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी देश पर विपत्ति आई है साहित्यकार ने राष्ट्र धर्म का निर्वहन किया है, चाहे वह मैथिलीशरण गुप्त या रामधारी सिंह दिनकर हों या माखनलाल चतुर्वेदी या गोस्वामी तुलसीदास हों, सभी ने अपने अपने समय में राष्ट्र-धर्म का निर्वहन किया है। मुख्य वक्ता डॉ त्रिभुवन नाथ शुक्ला ने अपने उद्बोधन में कहा कि कर्तव्य के प्रति ईमानदारी से अपने दायित्व का निर्वाह करना ही राष्ट्र धर्म है।साहित्यकार का राष्ट्र धर्म क्या होना चाहिए? साहित्यकार का धर्म है समाज में सकारात्मक ऊर्जा पैदा करना, हर क़दम पर समाज का मार्गदर्शन करना, समाज को और संस्कारित करना भी साहित्यकार का दायित्व है। उन्होंने कहा “शास्त्रेन रक्षितः राष्ट्र:” के द्वारा राष्ट्र की रक्षा की जा सकती है। साहित्यकार अपने राष्ट्र धर्म के प्रति तभी जागरूक रह सकता है जब वह अपने अंदर से संस्कारित हो। आज के समय में ओम शांति की जगह ओम क्रांति की आवश्यकता है।
वेबीनार का शुभारंभ डा.दक्षा जोशी, रिटायर्ड प्रिंसिपल,एम.जे.के. आर्ट्स, कॉमर्स एंड कंप्यूटर साइंस कॉलेज, राजकोट(गुजरात) की सस्वर सरस्वती वंदना के साथ हुआ। स्वागताध्यक्ष प्रो. नागेंद्र नारायण ने सभी वक्ता एवं श्रोताओं का शब्द सुमनों से स्वागत किया।संचालन के दायित्व का निर्वहन यशस्विनी साहित्यकार डॉ.पूनम माटिया (नई दिल्ली)ने अपने सुचयनित शब्दों से सफलतापूर्वक, प्रशंसनीय एवं साहित्यिक शब्दों से किया।
गोष्ठी की विशिष्ट वक्ता डॉ उषा श्रीवास्तव ने अपने उद्बोधन में कहा कि जो राष्ट्रहित में धारण किया जाए वही राष्ट्र धर्म है। उन्होंने वर्तमान में संपूर्ण विश्व व्यापी त्रासदी कोरोना द्वारा उत्पन्न की गई महामारी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में साहित्यकार का बहुत बड़ा आपद्धर्म है। दोसा (राजस्थान)से प्रो. डॉ निर्मला शर्मा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्यकार समाज में अपनी लेखनी के माध्यम से अंधकार को दूर करता है।सहितस्य भाव: इति साहित्य: भावना साहित्य में समाहित होती है। आज समाज के परिष्कार की आवश्यकता है। भोपाल से डॉ अर्पणा बादल ने कहा कि हमारे साहित्य साहित्यकार हमारे पुरोहित हैं। “वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिता:” साहित्यकार राष्ट्र का जागरण करता है। बिलासपुर छत्तीसगढ़ से डॉ रुचि मिश्रा ने कहा साहित्यकार समाज का एक बौद्धिक पुरोहित होता है। आज की महामारी के दौर में साहित्यकार अपनी कर्तव्यनिष्ठा पूर्वक अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं।
राजकोट से दक्षा जोशी ने अपने उद्बोधन में कहा कि राष्ट्र धर्म से जुड़े साहित्यकारों का साहित्य शांति एवं नव निर्माण से ओतप्रोत होता है। जब तक साहित्यकार ऐसे भावों का संचार नहीं करता, उसका साहित्य प्रासंगिक नहीं हो सकता।देश में सौमनस्य का भाव विकसित कर सकें, वही साहित्यकार का राष्ट्र धर्म है। राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक जागरण किसी भी साहित्य को गरिमामयी अनुभूति प्रदान करता है।वैबीनार के अंत में वैबीनार की सह-संयोजक प्रो. राखी चतुर्वेदी “पूर्णिमा”ने सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया। वैबीनार अपने उद्देश्य मे पूर्ण सफल रहा। इस गोष्ठी में लगभग 160 श्रोताओं ने भाग लिया जिसमें प्रमुख रूप से रूपा रानी (बेंगलुरु), प्रो.अलकेश चतुर्वेदी(जबलपुर), मिथिलेश श्रीवास्तव (वाराणसी), डॉ. राजकुमार मिश्रा (बिहार), आशा रावत (ग्वालियर), शोध विद्यार्थी रामगोपाल (मथुरा),डॉ. अमर ज्योति (चेन्नई),आरती मधोक,आशा रावत, बाबूलाल मीणा,अनिता चौधरी, अमरजीत कौर, अंगद प्रमाणिक, अनामिका द्विवेदी, अजीत सिंह ,अर्चना रोहतगी, भावना अरोड़ा,डॉ.दीप्ति गौर,डॉ. ममता उपाध्याय (रीवा),डॉ.नरेश स्वर्णकार,सुनीता सिंह,डॉ.किरन दीप सिंह,डॉ.संध्या गौतम, डॉ शालिनी माहेश्वरी,डा.गीता विवेक,नलिनी सिंह प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं ज़ो गोष्ठी के दौरान उपस्थित रहे।

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