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महान देेशभक्त स्वतंत्रता सेनानी बाबू रामविलास सिंह जी का एक कदम सृजनता की ओर

देेश के अमृत महोत्सव के परिपेक्ष्य में राष्ट्र सृजन अभियान की प्रासंगिकता

के.सी.श्रीवास्तव एड0 इडिटर दैनिक सृजन नेशनल न्यूज नेटवर्क  डायरेक्टर आदर्श जन चेतना समिति उ0 प्र0,ब्यूरो हेड तरूण मित्र हिन्दी समाचार पत्र चंदौली।

15 अगस्त, 2022 को देश की आजादी के 75 साल पूरे होने जा रहे हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए 75 वीं वर्षगांठ से एक साल पहले यानि 15 अगस्त 2021 से इन कार्यक्रमों की शुरुआत की गई। जिसमें देश की अदम्य भावना के उत्सव दिखाने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे है। इनमें संगीत, नृत्य, प्रवचन, प्रस्तावना पठन (प्रत्येक पंक्ति देश के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाली विभिन्न भाषाओं में) शामिल हैं। युवा शक्ति को भारत के भविष्य के रूप में दिखाते हुए गायकवृंद में 75 स्वर के साथ-साथ 75 नर्तक हैे। यह कार्यक्रम 15 अगस्त 2023 तक जारी रहेंगे। इसके साथ ही राष्ट्र सृजन अभियान अपने प्रणेता महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू रामविलास जी के 27 वे निर्वाण दिवस पर देश के 27 ऐतिहासिक जगहों पर राम विलास उत्सव के रूप में पूरे वर्ष उनके निर्वाण तिथि से सेलिब्रेट करने जा रहा है। जिसके लिए राष्ट्र सृजन अभियान के संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय चिंतक, विचारक एवं प्रखर राष्ट्रवादी वक्ता डाॅ. प्रद्युम्न कुमार सिन्हा की अगुवाई में जिसमें प्रमुख रूप से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डाॅ परशुराम सिंह , राष्ट्रीय महासचिव ललितेश्वर कुमार, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्या व गुजरात महिला प्रमुख डाॅ गीता देशप्रिया के साथ पूरे राष्ट्र के लाखों सृजन कार्यकर्ता वैचारिक क्रान्ति को आत्म निर्भर भारत,कोरोना मुक्त भारत,लोकल फार वोकल के साथ ही बेटर मी, बेटर वी,बेटर भारत, बेटर world  के साथ इस मुहिम को सफल बनाने में बिना रूके, बिना झुके प्रयत्नशील है।
महान देशभक्त स्वतंत्रता सेनानी बाबू रामविलास सिंह जी एक परिचय


शताब्दी संगम बेला में 10 फरवरी सन् 1894 ई0 में स्वतंत्रता सेनानी, किसान मजदूर नेता, शिक्षा प्रचारक, नारी सशक्तिकरण तथा दलितोत्थान के लिए अलख जगाँने वाले बाबू रामविलास सिंह जी का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था।जिनकी आज हम 27 वी पूण्य तिथि 27 ऐतिहासिक जगहो पर मनाई जा रही है। जिससें महत्व और भी बढ़ जाता है क्यो कि आज भारत आजादी का 75 वां सेलिब्रेसन भी मना रहा है। महान स्वतंत्रता सेनानी जिन्होने अपने जीवन को ही भारत माता के चरणों में समर्पित कर दिया था। जो बिहार- के जहानाबाद जिले के मखदुमपुर रेलवे स्टे्शन से दो किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित खस्कोचक में पैदा हुए थे जो रामविलास सिंह की जन्मभूमि है। पिता साधुशरण सिह संयुक्त परिवार में आठ भाइयों के बीच सबसे बड़े थे। इनके इकलौते पुत्र के रूप में जन्मे रामविलास सिंह का बचपन लाड़-प्यार में बीता। किसी शिक्षा प्रेमी किसान के घर पर जाकर इन्होंने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी। उस जमाने में स्वामी सहजानन्द सरस्वती के प्रताप से कर्मकाण्ड की पुस्तक हर भूमिहार के घर में थी। तब संस्कृत का प्रारंभिक ज्ञान इनके मूल में अनिवार्य था। यह काल देश-विदेश में चल रहे संघर्षों, अन्दोलनों और मुद्दों का काल था। स्वाभाविक रूप से अनेक धुरियों का संक्रमण रामविलास सिह में हुआ था । सामाजिक स्तर पर ये गांधीजी, सहजानन्द सरस्वती, नेता जी सुबाष चन्द्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल के साथ ही विनोबा भावे और जेपी में राष्ट्रीय जागरण का प्रतिरूप पाने लगे। ये आजीवन राष्ट्रवादी-समाजवादी तत्वों के सान्निध्य में रहे। दो विश्व युद्धों के बीच का काल राष्ट्र जागरण के लिए इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा। इनके संघर्षों का मूल काल यही है। मखदुमपुर, जहानाबाद और उसके आस-पास में कभी ये शिक्षा तथा महिला सशक्तिकरण के लिए गांधीजी के नेतृत्व में कार्य कर रहे थे। जो कभी स्वामी सहजानन्द के नेतृत्व में  आन्दोलन कर रहे थे और कभी स्वयं का नेतृत्व कर यमुने (स्थानीय नदी) को बांधकर खेतों के लिए पानी का प्रबंध कर रहे थे। श्रमदान पूँजी थी जो केन्द्रिय नेतृत्व ने कार्यकर्ताओँ को प्रदान किया था । राष्ट्रीय नेताओँ के त्याग, तप और बलिदान रामबिलास सिह को गांधीवादी, ईमानदार, देशभक्त और समाज-निर्मात्री बनाया। जिसने दलितोत्वान को अपने जीवन का मकसद बनाया। दुबला-पतला शरीर, गौर वर्ण और सर पर गांधी टोपी। एक बार जो खादी वस्त्र धारण किया तो फिर उसे जीवन भर छोड़ा नहीं। राष्ट्रीय आन्दोलन में अनेक संगी -साथी के साथ एक गांव से दूसरे गांव, एक शहर से दूसरे शहर में स्कूलों, कॉलेजों, आश्रमों तथा धर्मशालाओं में रात दिखाते घुमते रहे। खाने-पीने का लोभ नहीं । जो चंदा मिलता उसे किसी स्वदेशी आश्रम में जमा कर आते।
                                  असहयोग आन्दोलन के बाद,1923 में लगान का विरोध करनेवाला आंदोलन इनके नेतृत्व में हुआ। इस कारण उन्होंने एक अलग पहचान बनाकर अनवरत लडाई जारी रखी । आजादी की लडाई में पहली बार 1932 में ये दो माह के दिए जेल गए। गया के अनुमंडलाधिकारी ने अग्रेजों के खिलाफत के कारण देशद्रोह के जुर्म में सश्रम दो माह की कारावास की सजा दी। 22 फरवरी से 31 अप्रैल 1932 तक ये केन्द्रीय कारागार गया में रहे। अंग्रेजों ने इन्हें पुंनरू खिलाफत आन्दोलन के अंतर्गत देशद्रोह के जुर्म में कुछ ही माह बाद 26 जनवरी 1933 को गिरफ्तार कर लिया तथा केन्द्रीय कारागार गया में भेज दिया। इन्हें छह माह की सजा हुई। वे जेल में रहकर भी स्वतंत्रता संग्राम को संचालित कर रहे थे तो कुछ ही दिनों बाद इन्हें  कारागार में भेज दिया गया। जेल से रिहा होने के बाद वे और भी तीव्र गति से स्वतंत्रता’ संग्राम में सक्रिय हो पाये ।
जिसके कारण अमर हो गये बाबू जी

1942 के भारत छोडो आंदोलन के क्रम में उन्हें शीर्ष आन्दोलन के संपर्क में आने का मौका मिला। अगस्त आन्दोलन के क्रम में गया कलक्ट्रीयट पर झंडा फहराने का निर्णय लिया गया । इसका नेतृत्व राम विलास बाबू ने अपने हाथों में ले लिया । केशव भाई को कलक्ट्रीयट के छत पर चुपके से पहले ही चढा दिया गया था। ऐन बक्त पर कलक्ट्रीयट के ऊंचे कंगुरे पर विदेशी शासन का झण्डा ‘यूनियन जैक’ हटाकर उसकी जगह स्वराज का झंडा फहरा दिया गया। हटाए गए यूनियन जैक को रामविलास बाबू ने लपक लिया जो आजतक राष्ट्र सृजन अभियान के पास अमूल्य धरोहर के रूप में सुरक्षित है। दनादन गोलियों चलने लगी। जानकी कुंज के चक्रपाणी जी का नौजवान बेटा उस अभियान में शहीद हो गया। रामविलास सिंह के पैर में भी गोली लगी। गोली का शिकार होकर घायल अवस्था में ये 14 दिनों तक विष्णु पद के नाले में घायलावस्था में पड़े रहे । नेहरू, पटेल , सुभाष , कृपलानी ,मौलाना आजाद, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जैसे नेता इनके आदर्श बन चुके थे। विदेशी बस्त्रों की होली जलाना, महिला शिक्षा, खादी का व्यवहार, दलितोत्थान तथा किसान आंदोलन जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों से ये जुड़े तो फिर उनसे नाता कभी न छूटा।
                                  उन्होंने सहजानंद सरस्वती, यदुनंदन शर्मा तथा राहुल सांकृत्यायन के साथ मिलकर जमींदारी उन्मुलन में सक्रिय सहयोग दिया। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़ गए लेकिन बाद में कांग्रेस से मोहभंग हो गया। शिक्षा संस्थाओ के रूप में उच्च विद्यालयों एवं महाविद्यालयों की स्थापना में सक्रिय सहयोग किया । झूठ छल-कपट के विरोधी तथा उच्च नैतिकता कोे ये समाज के लिए आवश्यक मानते थे। आजादी के दो दशक बाद उन्होंने किसानों और स्कूलों के बीच अपने को समेट लिया। वे बड़े ही निराभिमानी और त्यागी थे। हिन्दू या मुसलमान किसी के बीच भी मतभेद हो तो वे ऐसा फैसला करते कि मुट्ठी ताने-बांधे आते और गले मिलकर जाते। बाल-प्रेम उनका अपार था। वे गीता के आदर्शों का सीख दिया करते थे। कर्म को सिर्फ कर्म समझ कर करते जाते। वे नर सेवा को नारायण सेवा मानते थे तथा जरूरतमंदों को हद से बाहर जाकर आर्थिक मदद भी किया करते थे। विनोबा भावे तथा जयप्रकाश नारायण में वे महात्मा गांधी का चेहरा देखते थे।
15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाॅंधी ने ताम्रपत्र देकर किया था सम्मानित

इंदिरा गांधी ने स्वतंत्रता सैनानियों को पेशन और सम्मान देने की घोषणा की तो इंदिरा गांधी के हाथों इन्हे’ भी सूट व ताम्र पत्र पहनाया गया।रामविलास सिंह द्वारा समाजसेवा का जो कार्य शुरु किया गया था उसका निर्वाह उन्होंने जीवन पर्यंत किया। उनके यहाँ जो पहुच जाता वह भोजन किए विना वापस नहीं होता। दूसरों का दुःख-कष्ट वे देख सह नहीं पाते थे। वे इसलिए रोष पालते थे क्योकि गांधीजी के चेलों ने गांधीवाद की हत्या कर दी । वे कहा करते थे कि गांधीजी का स्वतंत्रता आदोलन संघर्ष और सृजन का समंवय था। जबकि आज का राजनीतिक जीवन इसलिए श्रीहीन हो गया है क्योंकि उसमें अधिकार की आकांक्षा तो है लेकिन कर्तव्य की भावना नहीं। 95 वर्ष को शतकीय आयु में 7 सितम्बर 1994 को एक आतुर वाहन (एम्बुलेंस) में उन्होंने अंतिम सांस ली। गया के केन्द्रीय कारागार के ‘पास इनकी मृत्यु होना एक स्वतंत्रता सेनानी के लिए सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है अपितु विष्णुपद वाले इसे कर्मफल मानते हैं। इनके इकलौते पुत्र शिक्षाविद् राम प्रताप सिंह भी अब नहीं रहे लेकिन स्वतंत्रता सेनानी रामविलास सिंह ने अपने पीछे एक भरा पूरा परिवार छोड़ा है।
इनके पौत्र राष्ट्र सृजन अभियान के प्रमुख डाॅ0 प्रद्दुम्न कुमार सिंहा अपने दादा की पुण्यतिथि पर प्रति वर्ष स्वतंत्रता सेनानी रामविलास सिंह स्मृति न्यास अन्तर्गत धर्मार्थ, शिक्षा-उन्नयन एवं दलितोत्थान के लिए दान करने के साथ ही धर्म एवं जागरूकता शिविर आयोजित करते हैं।

राष्ट्र सृजन अभियान के प्रमुख डाॅ0 प्रद्दुम्न कुमार सिंहा

हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही,मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिए।
कौन कहता है कि आसमान में सूराख नही हो सकता,एक पत्थर तो तबीयत से उछालों यारो।। — दुष्यन्त कुमार
राष्ट्र सृजन की ओर हमारे कदम
राष्ट्र सृजन अभियान के संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय चिंतक, विचारक एवं प्रखर राष्ट्रवादी वक्ता डाॅ. प्रद्युम्न कुमार सिन्हा ने अभियान का ताना बाना पूरे देश व विदेशो में भी बुन रखा है। उनका मानना है कि देश को जब तक आत्म निर्भर,कोरोना मुक्त,लोकल फार वोकल, के साथ ही बेटर मी , बेटर बी, बेटर भारत व बेटर world के रूप में नही देख लेते उन्हे चैन नही आयेगा। इसके लिए अभियान की टीम बिना रूके बिना झुके अनवरत रूप से प्रयत्नशील है। लगातार प्रयास किये जा रहे है। पूरे राष्ट्र में बाबू रामविलास सिंह जी के 27 वे निर्वाण दिवस को देश के 27 ऐतिहासिक जगहो पर जिसमें से एक चंदौली जिले का कटवाॅं माफी गाॅंव भी है में रामविलास उत्सव के रूप में सेलिब्रेट किया जा रहा है।  इसके लिए देश में सब तरफ और हर स्तर पर ‘सृजन संवाद’ आयोजित करेंगे साथ ही पत्रिका भी प्रेषित करेंगे, ताकि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उपजी सकारात्मक ऊर्जा जुड़ सके, उम्मीद की मशाल जलती रहे।इतिहास के इस नाजुक मोड़ पर भारत का भविष्य आज आपसे और भविष्य के भारत से पूछता है- क्या उस अभूतपूर्व ऊर्जा को बिखरने दोगे जो सदियों से देश के हर एक युवा में है? क्या उस विश्वास को टूटने दोेगे जो पहली बार राजनीति से जुड़ी थी? क्या वो नव भारत के सपने को दफन होने दोगे?
राष्ट्र सृजन अभियान का दृढ संकल्प है कि वो ऐसा नहीं होने देगा। जंतर-मंतर से चली आदर्शों की मशाल बुझने न देंगे। रास्ता भले ही कठिन हो, कुछ हमसफर भले ही थक कर बैठ गए हों, लेकिन यह सफर रुकेगा नहीं, झुकेगा नही। हमें भरोसा है कि भारत और भारतवासियों में असीम संभावनाएं हैं। हमारा अटूट विश्वास है कि विकल्पहीन नहीं है दुनिया।
इस आस्था और संकल्प के बल पर आज हम एक लम्बी, कठिन लेकिन सुन्दर यात्रा पर निकले हैं।हम, यानि हम सब। यानि आप भी!
राष्ट्र सृजन अभियान एक राष्ट्रीय वैचारिक क्रान्ति है जिसका एक मात्र उद्येश्य “नये भारत का सृजन” है । उस भारत का सृजन जिसका सपना हमारे वीर महापुरुषों ने इस देश की आजादी, एकता, अखंडता, गौरव, विकास, संप्रुभता एवं सभ्यता के रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करते हुए देखा था । राष्ट्र सृजन अभियान का गठन 7 सितम्बर 1994 को किया गया। इस अभियान के मुख्य प्रेरणाश्रोत अमर स्वतंत्रता सेनानी बाबु रामविलास सिंह हैं । जिन्होंने बिहार के गया समाहरणालय पर अंग्रेजों के ध्वज “यूनियन जैक” को उतारकर “भारतीय तिरंगा” लहराया और इस दौरान अंग्रेजों के गरजती बंदूकों के गोलियों को हंसते हंसते झेला और और बाद में भी जेल यात्राओं के दौरान अनेक कष्ट झेले । हमारे सभी महापुरुष महात्मा गाँधी , सुभाष चन्द्र बोस, शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, प. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दिनदयाल उपाध्याय, रानी लक्ष्मीबाई, रानी चिन्नमा, तात्या टोपे सरीखे असंख्य वीर सपूतों को राष्ट्र सृजन अभियान आज इस महान स्वतंत्रता सेनानी की पूण्य तिथि पर ह्रदय से नमन, वंदन करता है और इन सभी की प्रेरणा से “एक नए विकसित भारत “ की संकल्पना के लिए कृतसंकल्पित है। वर्तमान में भारत एक नव भारत की ओर कदम बढ़ा रहा हैं। इस समय सम्पूर्ण संसार की नजरें भारत की बढती ताकतों और प्रगति की राहों को एकाग्रता पूर्वक देख रही है।देश की जनता भी इसकी आहट महसूस कर रही हैं और इस बढ़ते कदम में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जमकर साथ दे रही हैं। इस दिशा में एक कदम बढ़ाते हुए राष्ट्र सृजन अभियान जिसको चरितार्थ करने के लिए राष्ट्र सृजन अभियान के राष्ट्रीय प्रमुख प्रख्यात अन्त राष्ट्रीय चिंतक व विचारक डाॅ प्रद्युम्न कुमार सिंहा ने “राष्ट्र सृजन एक संकल्प” का नारा देते हुए भारत सरकार के महत्वकांछी योजनाओं को पटल पर लाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं। अभियान के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर कैम्पों, सम्मेलनों,कार्यशालाओं, स्वयंसेवी समूहों के द्वारा इन कार्यक्रमों को जमीनी स्तर तक पहुँचाया जा रहा है।
आजादी का अमृत महोत्सव , चरखे के रास्ते वोकल फॉर लोकल
इस आयोजन के माध्यम से ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है। इसे लोकप्रिय बनाने के लिए साबरमती आश्रम में मगन निवास के पास एक चरखा स्थापित किया जाएगा। कोई भी व्यक्ति जब कोई भी स्थानीय उत्पाद खरीदेगा और ‘वोकल फॉर लोकल’ का इस्तेमाल करते हुए उसकी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट करेगा तो आत्मनिर्भरता से संबंधित प्रत्येक ट्वीट के साथ यह चरखा एक बार घूमेगा।
अमृत महोत्सव यानी नए संकल्पों का अमृत

पीएम मोदी ने कहा कि आजादी का अमृत महोत्सव यानी आजादी की ऊर्जा का अमृत। आजादी का अमृत महोत्सव यानी स्वाधीनता सेनानियों से प्रेरणाओं का अमृत। आजादी का अमृत महोत्सव यानी नए विचारों का अमृत। नए संकल्पों का अमृत। आजादी का अमृत महोत्सव यानी आत्मनिर्भरता का अमृत।
आजादी का अमृत महोत्सव देश की 75वीं वर्षगाठ के साथ रामविलास उत्सव का यह है मतलब
देश की 75 वीं वर्षगांठ का मतलब 75 साल पर विचार, 75 साल पर उपलब्धियां, 75 पर एक्शन और 75 पर संकल्प शामिल हैं, जो स्वतंत्र भारत के सपनों को साकार करने के लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा देंगे। वही रामविलास उत्सव के रूप में पूरे देश में 27 ऐतिहासिक जगहो पर अनवरत रूप से पूरे कैलेंडर वर्ष राष्ट्रीय वैचारिक क्रान्ति का आयोजन किया जाता रहेगा।

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