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जनसंख्या नियंत्रण का कानून बनाकर अविलम्बं रोकना है जरूरी – डा0 पी के सिन्हा

दैनिक सृजन नेशनल न्यूज नेटवर्क ब्यूरो रिर्पोट नई दिल्ली।

योगी सरकार का तर्क है कि राज्य की आबादी जिस तरह बढ़ रही है, उससे हेल्थ समेत अन्य सुविधाएं देने में दिक्कत आ रही है। जनसंख्या पर काबू करना बेहद जरूरी हो गया है। इससे लोगों को सुविधाएं देने और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल में मदद मिलेगी। उक्त बाते दैनिक सृजन के साथ एक वार्ता के दौरान राष्ट्र सृजन अभियान के प्रमुख व अन्र्तराष्ट्रीय चिंतक व विचारक डॉ 0 पी के सिन्हा ने कही। उन्होेने कहा कि सच तो यह है कि योगी का प्रस्तावित कानून राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे को आगे बढ़ाता है। संघ के विश्व हिंदू परिषद जैसे अनुषांगिक संगठन लगातार आशंका जता रहे हैं कि अगर मुस्लिमों की बढ़ती आबादी को नहीं रोका गया तो कुछ ही साल में भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे।
यू पी का प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण कानून क्या है?

इसमें किस तरह के प्रावधान रखे गए हैं?

इस कानून को मुस्लिम विरोधी क्यों बताया जा रहा है?

यूपी पॉपुलेशन ड्राफ्ट बिल क्या है?

 यू पी स्टेट लॉ कमीशन ने उत्तरप्रदेश पॉपुलेशन (कंट्रोल, स्टेबलाइजेशन एंड वेलफेयर) बिल 2021 जारी किया है। प्रस्तावित कानून टू-चाइल्ड पॉलिसी को बढ़ावा देता है। जो लोग दो ही बच्चे पैदा करेंगे, उन्हें कई रियायतों का वादा किया गया है। इसके उलट दो से ज्यादा बच्चे वालों को कई तरह के नुकसान हो सकते हैं।
यह कानून किस पर लागू होगा?
– यह कानून उत्तरप्रदेश में रहने वाले उन सभी विवाहित दंपती पर लागू होगा, जहां लड़के की उम्र 21वर्ष और लड़की की उम्र कम से कम 18 वर्ष है।

उत्तरप्रदेश ने अपना जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की पेशकश की है। स्टेट लॉ कमीशन ने इसका ड्राफ्ट जारी किया है। यू पी में अगले साल विधानसभा चुनाव है। ऐसे में संघ के एजेंडे में शामिल जनसंख्या नियंत्रण कानून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। कर्नाटक समेत कुछ अन्य राज्य भी इसमें रुचि ले रहे हैं।


योगी सरकार का तर्क है कि राज्य की आबादी जिस तरह बढ़ रही है, उससे हेल्थ समेत अन्य सुविधाएं देने में दिक्कत आ रही है। जनसंख्या पर काबू करना बेहद जरूरी हो गया है। इससे लोगों को सुविधाएं देने और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल में मदद मिलेगी।
पर सच तो यह है कि योगी का प्रस्तावित कानून राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे को आगे बढ़ाता है। संघ के विश्व हिंदू परिषद जैसे अनुषांगिक संगठन लगातार आशंका जता रहे हैं कि अगर मुस्लिमों की बढ़ती आबादी को नहीं रोका गया तो कुछ ही साल में भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे।
एडॉप्शन करने वालों के लिए कानून क्या कहता है?
 एडॉप्शन के मामले में कानून के तहत किसी भी व्यक्ति के बच्चों की संख्या 3 से अधिक नहीं हो सकती। अगर किसी व्यक्ति की शादी से दो बच्चे हैं और वह तीसरे को एडॉप्ट करता है तो कानून का उल्लंघन नहीं होगा। पर वह एक से अधिक बच्चे को एडॉप्ट नहीं कर सकेगा।
 इसी तरह अगर किसी व्यक्ति को अपनी शादी से कोई बच्चा नहीं है तो वह दो से अधिक बच्चों को एडॉप्ट नहीं कर सकता। अगर तीन या अधिक बच्चों का एडॉप्शन होता है, तो यह कानून का उल्लंघन माना जाएगा।
कानून में किन परिस्थितियों को अपवाद के तौर पर शामिल किया गया है?
कानून में ऐसी परिस्थितियों की भी पहचान की गई है, जिन्हें अपवाद माना जा सकता है, जैसे-
 दूसरी बार गर्भवती होने पर अगर एक से ज्यादा बच्चे जन्म लेते हैं या पहली बार में दो से अधिक बच्चे होते हैं तो यह कानून का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।
अगर दो बच्चों में से एक बच्चा दिव्यांग है तो ऐसे दंपती को तीसरे बच्चे को जन्म देने की इजाजत दी जाएगी।
इसी तरह दो में से किसी एक बच्चे की मौत होने पर भी ऐसे दंपती को तीसरे बच्चे को जन्म देने की इजाजत होगी।
एक से अधिक पति या पत्नी होने पर क्या होगा?
इस मामले में प्रत्येक दंपती को अलग यूनिट माना जाएगा। उसके आधार पर उनके बच्चों की गिनती होगी। पर अगर जिस व्यक्ति ने एक से अधिक शादी की है, वह सभी शादियों से दो से अधिक बच्चे पैदा करता है तो वह कानून का उल्लंघन होगा।
क्या यू पी सरकार से कुछ छूट गया है?
हां। विशेषज्ञ कहते हैं कि कानून में सिंगल पेरेंट्स या शादी के बिना बच्चे पैदा करने वालों के लिए कोई प्रावधान नहीं है। पर संकेत साफ है कि माता-पिता के जैविक बच्चों को गिना जाएगा। भले ही उन्होंने कानूनन शादी की है या नहीं।
इसके अलावा विधवा-विधुर के पुनर्विवाह पर भी इसका असर पड़ सकता है। कई मामलों में बच्चा होना एक अहम शर्त रहती है और अगर कानून इसकी इजाजत नहीं देता तो पुनर्विवाह के मामलों पर असर पड़ सकता है। इससे विधवाओं के सोशियो-इकोनॉमिक स्टेटस और री मैरिज की संभावना कम हो जाएगी।
इसे योगी आदित्यनाथ का चुनावी दांव क्यों कहा जा रहा है?
जनसंख्या नियंत्रण संघ के एजेंडे में सबसे ऊपर रहा है। दो दिन पहले ही संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देश में जनसंख्या को नियंत्रित करने की जरूरत बताई है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यह कानून कहीं न कहीं हिंदुओं और मुस्लिमों के वोटों में ध्रुवीकरण लाएगा और इसका फायदा अगले साल के शुरुआत में होने वाले चुनावों में भाजपा को मिल सकता है।
संभल के समाजवादी पार्टी विधायक इकबाल मेहमूद का आरोप है कि यह कानून मुस्लिमों के खिलाफ साजिश है। पॉपुलेशन कंट्रोल के बहाने मुस्लिमों पर हमला है। वहीं, सुन्नी शैक्षणिक संस्था दारुल उलूम देवबंद ने भी इस कानून को मानवाधिकार के खिलाफ बताया है।
पर विश्व हिंदू परिषद चीफ आलोक कुमार ने भी कानून को लेकर अपनी आपत्ति जाहिर की है। उनका कहना है कि प्रस्तावित कानून में दो बच्चे रखने पर जो इंसेन्टिव दिए जाने की बात है, वह राज्य के डेमोग्राफी को प्रभावित कर सकता है।
क्या वाकई में यह कानून मुस्लिम विरोधी है?

 कुछ हद तक। राज्य की कुल 22 करोड़ आबादी में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी मुस्लिमों की है। इस पर महत्वपूर्ण बात यह है कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-4) के मुताबिक राज्य में मुस्लिमों का टोटल फर्टिलिटी रेट 3.1 है, जो हिंदुओं के 2.7 से कहीं अधिक है। टोटल फर्टिलिटी रेट को निकालने का फॉर्मूला बहुत आसान है। एक महिला से होने वाले बच्चों की संख्या का औसत ही टोटल फर्टिलिटी रेट या ज्थ्त् कहलाता है।
ऽ अगर यह कानून लागू होता है तो दूसरा सबसे बड़ा असर अनुसूचित जाति पर पड़ेगा, जिसकी राज्य में आबादी 20प्रतिशत है।इनका फर्टिलिटी रेट भी 3.1 बताया गया है। वहीं, अनुसूचित जनजाति का फर्टिलिटी रेट तो 3.6 है, पर राज्य में इस तबके की आबादी 1 प्रतिशत से भी कम है।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि योगी इस कानून को पास करवा देते हैं तो मुस्लिम और दलित वोटरों का ध्रुवीकरण करने में भाजपा कामयाब हो जाएगी और इससे उसकी जीत की संभावना कई गुना बढ़ जाएगी।
यह प्रस्तावित कानून लागू कब होगा?
 राजपत्र में प्रकाशित होने के एक साल बाद यह लागू होगा। न्‍यू स्टेट लॉ कमीशन के अध्यक्ष आदित्यनाथ मित्तल ने कहा है कि 19 जुलाई तक सुझाव और आपत्तियां आ जाएंगी तो उसके आधार पर अगस्त के दूसरे हफ्ते तक फाइनल ड्राफ्ट तैयार होगा। इसे भी पब्लिक डोमेन में रखा जाएगा।
विधेयक को अंतिम रूप देने के बाद विधानसभा से पारित कराने की जरूरत होगी। मौजूदा परिस्थितियों में प्रस्तावित कानून के मानसून सत्र में पास होने की संभावना कम है। अगर विधानसभा से विधेयक पारित नहीं हो पाया तो भाजपा इसका इस्तेमाल चुनावी स्टंट के तौर पर कर सकती है।
 आम लोगों और विशेषज्ञों से 19 जुलाई तक statelawcommission2018@gmail-com या स्टेट लॉ कमीशन, उत्तरप्रदेश के पते पर पोस्ट के जरिए सुझाव मांगे गए हैं।
पॉपुलेशन कंट्रोल के प्रस्तावित कानून को लागू करने के लिए सरकार की क्या तैयारी है?
उत्तर प्रदेश के प्रस्तावित कानून में पॉपुलेशन कंट्रोल के लिए राज्य सरकार ने यह कदम उठाने की तैयारी जाहिर की है-
– सेकेंडरी स्कूलों में पॉपुलेशन कंट्रोल के तौर पर अनिवार्य विषय होगा।
-स्टेट पॉपुलेशन फंड बनेगा ताकि इन योजनाओं के लिए फंड की व्यवस्था की जा सके।
-सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मैटरनिटी सेंटर बनाए जाएंगे। यहां से गर्भनिरोधक दवाएं, कंडोम आदि वितरित होंगे।
-कम्युनिटी हेल्थ वर्कर फैमिली प्लानिंग के तरीकों के बारे में लोगों को जागरूक करेंगे।
-प्रेग्नेंसी के साथ ही डिलीवरी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा, जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रेशन भी अनिवार्य होगा।
– सुरक्षित गर्भपात के लिए भी सिस्टम विकसित करने पर फोकस होगा।
इस प्रकार से अगर सरकार जनसंख्या नियंत्रण कानून को ला देती है तो यह हमारे देश के विकास में अहम योगदान देगा। जिससे प्रदेश ही नही देश का सबसे बड़ा राज्य होने के नाते देश पर भी खासा असर पड़ेगा। वही गुरूवार को वाराणसी में देश के प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी माना कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अद्वितीय है। इनकी जितनी भी तारीफ की जाय कम है। क्यों कि जिस प्रकार से इन्होने कोरोना के दूसरे वेग पर नियंत्रण स्थापित किया वह काबिले तारीफ है।

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