Home राज्य उत्तर-प्रदेश समावेशी विकास के पक्षधर थे बाबू रामविलास सिंह जी

समावेशी विकास के पक्षधर थे बाबू रामविलास सिंह जी

दैनिक सृजन नेशनल न्यूज नेटवर्क ब्यूरो रिर्पोट नई दिल्ली। 

महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू रामविलाश सिंह जी

“खिदमते मुल्क का जब दिल में ख्याल आएगा,खुद -ब-खुद पास चला हुनरो कमाल आएगा ।
सबसे पहले ही मैं मकतल में पहुँच जाऊंगा ,जब वतन के लिए मरने का सवाल आएगा ।
उक्त पंक्ति समाजवादी नेता बाबू रामविलास सिंह पर चरितार्थ होती है ।उनके नाम में ही सब कुछ समाहित है जो आदि व अंत का प्रतिनिधित्व करता है जो सृष्टि के रचना का प्रतीक हो उस महापुरुष का जीवन दर्शन तो अद्भुत होगा ही ।
महान स्वतंत्रता सेनानी , दिन दुखियों ,अभावग्रस्तों तथा पीड़ितों के उद्धारक ,कुशल राजनेता , मजदूर व किसानों के हितैसी ,महात्मा गांधी , विनोबा भावे, देशरत्न राजेंद्र प्रसाद ,लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आदर्शो को आत्मसात करने वाले महान वीर ,राष्ट्रसृजन अभियान के जनक बाबू रामविलास सिंह जी जनमानस के अमूल्य निधि थे ,इनका व्यक्तित्व व कृतित्व इतना महान व सर्वग्राही है कि हर जन अपना कर अपने को धन्य समझता है । बाबू रामविलास सिंह जी के आध्यात्मिक ज्ञान- विज्ञान में विश्व के लोकनायक महात्मा बुद्ध तथा कुशल रणनीतिकार में भगवान श्री कृष्ण का दर्शन होता है ।भगवान बुद्ध से इतना लगाव था कि इनका निर्वाण बुद्ध के कर्म व ज्ञान भूमि बोधगया में ही हुआ तथा भगवान श्री कृष्ण की तरह विराट सोच व रणनीति थी जो कभी जीवन को बोझिल नहीं होने दिए तथा आजीवन पराजय स्वीकार नहीं किए ।
किसानों के प्रति असीम लगाव था जो सदैव कहा करते थे कि ” किसान हमारे राष्ट्र की आत्मा है ।उस पर पड़ी निराशा की छाया को हटाई जाए ,तभी हिंदुस्तान का उद्धार हो सकता है ।इसके लिए यह आवश्यक है कि हम यह अनुभव करें कि किसान हमारा है और हम किसान के है ।” आज इनके स्वप्न को विश्व के सर्वमान्य नेता तथा भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी साकार कर रहे है ।रामविलास बाबू ने जो सपना देखा था तथा जो अधूरे कार्य था उसको धरातल पर लाने के लिए इनके पोता महान समाजसेवी ,शिक्षाविद ,उत्कृष्ट चिंतक तथा राष्ट्रसृजन अभियान के अध्यक्ष प्रद्युम्न कुमार सिन्हा तथा अभियान के राष्ट्रीय सचिव ललितेश्वर कुमार दिन-रात कठोर मेहनत करते हुए राष्ट्र के रचनात्मक विकास में महती योगदान दे रहे है । बाबू रामविलास सिंह जी जीवन की कला को सिखाते हुए बोलते थे कि ” जीवन मौत से नहीं खोया जाता ,जीवन खोया जाता है क्षण -क्षण को दिनोंदिन सहस्त्रों अत्यंत लापरवाही युक्त तरीकों से घसीटते रहने से ,आशा अमर धन है ,किंतु आशा में जीवन के अमूल्य क्षणों ,दिनों व वर्षों को निष्क्रिय रूप से व्यतीत करने से अधिकांश बार निराशा ही हाथ लगती है ।जीवन प्रतिक्षण अहर्निश चलते रहने का नाम है ।
बाबू हमेशा कहा करते थे “हमारा सबसे बड़ा धर्म है ,आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना ।चाहे धन,मान ,कुटुंब और प्राणों तक का त्याग करना पड़े,पर धर्म को कदापि न छोड़ा जाय।”
बाबू एक सम्पूर्ण कर्मयोगी की तरह अपने विद्रोह और क्रांति के कार्य पूरे किए ।वे परिवर्तन प्रक्रियाओं से प्राप्त प्रतिफलों से चिपक कर बैठे नहीं रहे ,बल्कि उनका सारा जीवन प्रदर्शनों का अटूट सिलसिला था ।असली कर्मयोगी कभी अपनी क्रांति की उपलब्धियों से प्रफुल्लित होकर शांत नहीं हो जाता क्योंकि उसे सामाजिक व्यवस्था को मुस्तैद रखना है ,जो कभी न समाप्त होने वाली प्रक्रिया है ।
उन्होंने एक ओर तो हमारे सामाजिक न्याय्यता के अभिगम में क्रांतिकारी बदलाव किया और दूसरी ओर सामाजिक स्वतंत्रता को ।बाबू आजीवन क्षमता और प्रदर्शन के समन्वय पर जोर दिया और वैसा ही जीवन जिया ।उन्होंने हमेशा नई क्षमता प्राप्त करने तथा उसमें और सुधार करने का आह्वान किया और उनकी सहायता की जो अच्छा प्रदर्शन करते थे ।
बाबू के पोता प्रद्युम्न कुमार सिन्हा भी बिल्कुल इन्ही के रास्ते पर चलते हुए देश के यशस्वी व अजेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को साकार करने के लिए राष्ट्रव्यापी मुहिम छेड़े है ,पूरे जोश व उत्साह के साथ तथा संगठन विस्तार के नायक बने है ।बाबू सदैव कहा करते थे कि हममें से प्रत्येक अपने माता -पिता ,गुरु,और समाज के ऋणी हैं ।आंदोलन के क्रम में उन्होंने सिद्ध किया कि व्यक्ति समाज के ऋण को अपने सामान्य कार्यों व पूजन के द्वारा उतार सकता है ।

                              बाबू रामविलास सिंह जी अनवरत स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए जागरूक रहते थे ।वे कहा करते थे कि दुनिया की आधी आबादी को शिक्षित करने के बाद ही हम सभ्य व शिक्षित समाज की परिकल्पना कर सकते है । वे बताते थे कि हमारे देश में स्त्री शिक्षा की परम्परा अत्यंत प्राचीन तथा गौरवपूर्ण है ।यहाँ की स्त्रियां उच्च -से -उच्च शिक्षा प्राप्त किया करती थी तथा इस क्षेत्र में कभी -कभी तो वे पुरुषों को भी पीछे छोड़ देती थीं ।गार्गी हमारे देश की ऐसी ही एक महिला थी जिसने मिथिलेश जनक की राज -सभा में उस युग के सबसे बड़े तत्व -ज्ञानी याज्ञवल्क्य जैसे महर्षि को भी ब्रह्मविद्या में पराजित किया था ।हम चाहते हैं कि हमारे देश में ऐसी अनेक गार्गीयां उतपन्न होकर इस पवित्र भूमि को पावनतर बनाने का प्रयत्न करें ताकि मनु भगवान का नारी महत्व की सपना साकार हो -“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवताः“।

राष्ट्र सृजन अभियान के संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय चिंतक, विचारक एवं प्रखर राष्ट्रवादी वक्ता डाॅ. प्रद्युम्न कुमार सिन्हा

राष्ट्र सृजन अभियान को पूरो करने में लगे उनके पौत्र डॉ पी के सिन्हा
राष्ट्र सृजन अभियान के संस्थापक सह राष्ट्रीय अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय चिंतक, विचारक एवं प्रखर राष्ट्रवादी वक्ता डाॅ. प्रद्युम्न कुमार सिन्हा ने अभियान का ताना बाना पूरे देश व विदेशो में भी बुन रखा है। उनका मानना है कि देश को जब तक आत्म निर्भर,कोरोना मुक्त,लोकल फार वोकल, के साथ ही बेटर मी , बेटर बी, बेटर भारत व बेटर world के रूप में नही देख लेते उन्हे चैन नही आयेगा। इसके लिए अभियान की टीम बिना रूके बिना झुके अनवरत रूप से प्रयत्नशील है। लगातार प्रयास किये जा रहे है। पूरे राष्ट्र में बाबू रामविलास सिंह जी के 27 वे निर्वाण दिवस को देश के 27 ऐतिहासिक जगहो पर जिसमें से एक चंदौली जिले का कटवाॅं माफी गाॅंव भी है में रामविलास उत्सव के रूप में सेलिब्रेट किया जा रहा है।  इसके लिए देश में सब तरफ और हर स्तर पर ‘सृजन संवाद’ आयोजित करेंगे साथ ही पत्रिका भी प्रेषित करेंगे, ताकि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उपजी सकारात्मक ऊर्जा जुड़ सके, उम्मीद की मशाल जलती रहे।इतिहास के इस नाजुक मोड़ पर भारत का भविष्य आज आपसे और भविष्य के भारत से पूछता है- क्या उस अभूतपूर्व ऊर्जा को बिखरने दोगे जो सदियों से देश के हर एक युवा में है? क्या उस विश्वास को टूटने दोेगे जो पहली बार राजनीति से जुड़ी थी? क्या वो नव भारत के सपने को दफन होने दोगे?
राष्ट्र सृजन अभियान का दृढ संकल्प है कि वो ऐसा नहीं होने देगा। जंतर-मंतर से चली आदर्शों की मशाल बुझने न देंगे। रास्ता भले ही कठिन हो, कुछ हमसफर भले ही थक कर बैठ गए हों, लेकिन यह सफर रुकेगा नहीं, झुकेगा नही।

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